Neha's Alarm Clock Explained in Hindi
Nasruddin’s Aim Class 4 Hindi translation
Raskhan रसखान
रसखान कृष्ण के भक्त थे और प्रभु श्रीकृष्ण के
सगुण और निर्गुण निराकार रूप के उपासक थे। रसखान ने कृष्ण की सगुण रूप की लीलाओं
का बहुत ही खूबसूरत वर्णन किया है. जैसे- बाललीला, रासलीला,
फागलीला, कुंजलीला आदि।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने एकबार कुछ मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था: “इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए” | उनके मत में “रसखान” का नाम भक्तकालीन मुसलमान कवियों में सर्वोपरि है। रसखान का जन्म संवत् 1590 ई. मानना अधिक उचित प्रतीत होता है। अकबर का राज्यकाल 1556-1605 है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। रसखान का जन्मस्थान ‘पिहानी’ कुछ लोगों के मतानुसार दिल्ली के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह ‘पिहानी’ उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले में है। कवि रसखान की मृत्यु के बारे में कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं मिलते हैं।
रसखान का असली नाम सैयद इब्राहिम था और “खान’
उसकी उपाधि थी। नवलगढ़ के राजकुमार संग्राम सिंह द्वारा प्राप्त रसखान के चित्र पर
नागरी लिपि के साथ-साथ फ़ारसी लिपि में भी एक स्थान पर “रसखान’ तथा दूसरे स्थान पर
“रसखाँ’ ही लिखा पाया गया है।
फ़ारसी कवि अपना नाम संक्षिप्त रखते थे| इसी तरह रसखान ने भी अपने नाम खान के पहले “रस’ लगाकर स्वयं को रस से भरे
खान या रसीले खान की धारणा के साथ काव्य-रचना की। उनके जीवन में रस की कमी न थी। पहले
लौकिक रस का आस्वादन करते रहे, फिर अलौकिक रस में लीन होकर
काव्य रचना करने लगे। एक स्थान पर उनके काव्य में “रसखाँ’ शब्द का प्रयोग भी मिलता
है। ।
रसखान के पिता एक जागीरदार थे। इसलिए इनका
लालन पालन बड़े लाड़-प्यार से हुआ माना जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनके
काव्य में किसी विशेष प्रकार की कटुता का सरासर अभाव पाया जाता है।
एक
संपन्न परिवार में पैदा होने के कारण उनकी शिक्षा अच्छी और उच्च कोटि की हुयी थी।
उनकी यह विद्वत्ता उनके काव्य की अभिव्यक्ति में जग ज़ाहिर है. रसखान को फ़ारसी,
हिंदी एवं संस्कृत का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने “श्रीमद्भागवत’ का फ़ारसी में अनुवाद किया था। इसको देख कर इस बात का सहज
अनुमान लगाया जा सकता है कि वह फ़ारसी और हिंदी भाषाओं के अच्छे जानकर रहे होंगे
अब्राहम जार्ज ग्रियर्सन ने लिखा है कि रसखान
बाद में वैष्णव होकर ब्रज में रहने लगे थे। इसका वर्णन ‘भक्तमाल’ में है।
मानुष
हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वालन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।
जो खग हौं बसेरो करौं मिल, कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।
कहा जाता है कि एक समय वे कहीं भागवत कथा में उपस्थित थे। व्यासगद्दी के पास श्यामसुन्दर का चित्र रखा हुआ था। उनके नयनों में भगवान का रूपमाधुर्य समा गया। उन्होंने प्रेममयी मीठी भाषा में व्यास से भगवान श्रीकृष्ण का पता पूछा और ब्रज के लिये चल पड़े। रासरसिक नन्दनन्दन से मिलने के लिये विरही कवि का हृदय-बीन बज उठा। ब्रजरज का मस्तक से स्पर्श होते ही, भगवती कालिन्दी के जल की शीतलता के स्पर्श-सुख से वे अपनी सुधि-बुधि खो बैठे। संसार छूट गया, भगवान में मन रम गया। वे कह उठे-
या लकुटी अरु कामरिया पर राज
तिहू पुर कौ तजि डारौं।
आठहु सिद्धि नवौं निधि कौ सुख नंद की गाय चराय बिसारौं।।
'रसखान' सदा इन नयनन्हिं सौं ब्रज के बन बाग
तड़ाग निहारौं।
कोटिन हू कलधौत के धाम करील की कुंजन ऊपर वारौं।।
कितना अद्भुत आत्मसमर्पण था, भावमाधुर्य था।
प्रेमसुधा का निरन्तर पान करते वे ब्रज की शोभा देख रहे थे।
उनके पैरों में विरक्ति की बेड़ी थी, हाथों में अनुरक्ति की
हथकड़ी थी, हृदय में भक्ति की बन्धन-मुक्ति थी। रसखान के
दर्शन से ब्रज धन्य हो उठा। ब्रज के दर्शन से रसखान का जीवन सफल हो गया।
कृष्ण-भक्ति ने उन्हें ऐसा मुग्ध कर दिया कि
गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली और ब्रजभूमि में जा बसे। सन् 1628
के लगभग उनकी मृत्यु हुई। सुजान रसखान और प्रेमवाटिका उनकी उपलब्ध
कृतियाँ हैं। प्रमुख कृष्णभक्त कवि रसखान की अनुरक्ति न केवल कृष्ण के प्रति प्रकट
हुई है बल्कि कृष्ण-भूमि के प्रति भी उनका अनन्य अनुराग व्यक्त हुआ है। उनके काव्य
में कृष्ण की रूप-माधुरी, ब्रज-महिमा, राधा-कृष्ण
की प्रेमलीलाओं का मनोहर वर्णन मिलता है। वे अपनी प्रेम की तन्मयता, भाव-विह्नलता और आसक्ति के उल्लास के लिए जितने प्रसिद्ध हैं उतने ही अपनी
भाषा की मार्मिकता, शब्द-चयन तथा व्यंजक शैली के लिए। उनके
यहाँ ब्रजभाषा का अत्यंत सरस और मनोरम प्रयोग मिलता है, जिसमें
ज़रा भी शब्दाडंबर नहीं है।
देख्यो रुप अपार मोहन सुन्दर स्याम को।
वह ब्रज राजकुमार हिय जिय नैननि में बस्यो।
दोहे का अर्थ-👇 इस
दोहे में कवि रसखान जी कहते हैं कि अति सुंदर ब्रज के राजकुमार श्री कृष्ण उनके
हृदय,
मन, मिजाज,जी, जान और आंखों में निवास बना कर बस गए हैं। मोहन छवि रसखानि लखि अब दृग
अपने नाहिं
उंचे आबत धनुस से छूटे सर से जाहिं।
दोहे का अर्थ-👇 इस
दोहे में रसखान कहते हैं कि मदन मोहन कृष्ण की सुंदर रुप छटा देखने के बाद अब ये
आँखें मेरी नही रह गई हैं जिस तरह धनुष से एक बार बाण छूटने के बाद अपना नही रह
जाता है। और तीर फिर दोबारा लौटकर नहीं आताहै, वापिस नही
होता है।
मो मन मानिक लै गयो चितै चोर नंदनंद
अब बेमन मैं क्या करुं परी फेर के फंद।
दोहे का अर्थ-👇
इस दोहे में भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपनी
प्रेम भावना उजागर करते हुए कहते हैं कि मेरे मन का माणिक्य रत्न तो चित्त को
चुराने बाले नन्द के नंदन श्री कृष्ण ने चोरी कर लिया है। अब बिना मन के वे क्या
करें। वे तो भाग्य के फंदे के-फेरे में पड़ गये हैं। अब तो बिना समर्पण कोई उपाय
नही रह गया है। अर्थात जब उनका मन ही श्री कृष्ण के पास है तो वे पूरी तरह से
समर्पित हो चुके हैं।
बंक बिलोचन हंसनि मुरि मधुर बैन रसखानि
मिले रसिक रसराज दोउ हरखि हिये रसखानि।
दोहे का अर्थ-👇
इस दोहे में कवि रसखान जी कहते हैं कि तिरछी
नजरों से देखकर मुस्कुराते और मीठी बोली बोलने बाले मनमोहन कृष्ण को देखकर उनका
हृदय आनन्दित हो जाता है। अर्थात जब रसिक और रसराज कृष्ण मिलते हैं तो हृदय में
आनन्द का प्रवाह होने लगता है।
या छवि पै रसखान अब वारौं कोटि मनोज
जाकी उपमा कविन नहि पाई रहे कहुं खोज।
इस दोहे में रसखान जी कहते हैं कि श्री कृष्ण
के अति सुंदर और मनोहर रुप पर करोंड़ो कामदेव न्योछावर हैं, वहीं उनकी तुलना विद्धान कवि भी नहीं खोज पा रहे हैं अर्थात श्री कृष्ण के
सौन्दर्य रूप की तुलना करना संभव नहीं है।
जोहन नंद कुमार को गई नंद के गेह
मोहि देखि मुसिकाई के बरस्यो मेह सनेह।
दोहे का अर्थ-👇
इस दोहे में महाकवि रसखान जी कहते हैं कि जब
वे श्री कृष्ण से मिलने उनके घर गए तब उन्हें देखकर श्री कृष्ण इस तरह मुस्कुराये
जैसे लगा कि उनके स्नेह प्रेम की बारिश चारों तरफ होने लगी। इसके साथ ही श्याम का
स्नेह रस हर तरफ से बरसने लगा।
प्रेम हरि को रुप है त्यौं हरि प्रेमस्वरुप
एक होई है यों लसै ज्यों सूरज औ धूप।
दोहे का अर्थ-👇
रसखान प्रेमी भक्त कवि थे। वे प्रेम को हरि का
रुप या पर्याय मानते हैं और ईश्वर को साक्षात प्रेम स्वरुप मानते हैं।
प्रेम एवं परमात्मा में कोई अन्तर नहीं होता
जैसे कि सूर्य एवं धूप एक हीं है और उनमें कोई तात्विक अन्तर नहीं होता।
काग के भाग बड़े सनती !
हरि हाथ सौ ले गयो माखन रोटी !!
अर्थ : इस
दोहे में रसखान जी कहते है कि वह कोआ बहुत भाग्यशाली है जो श्री कृष्ण के हाथो से
माखन रोटी छीन कर ले गया ! प्रभु के हाथ से माखन रोटी लेने का सौभाग्य उस कौए का
प्राप्त हुआ है
ब्रह्म मैं ढूंढ्यों पुराननि
गाननि, वेद रिचा सुनि चौगुने चायन।
देख्यों सुन्यों कबहुं न कितूं वह कैसे सरूप ओ कैसे सुभायन।।
टेरत टेरत हारि पर्यौ 'रसखान' बतायौ न लोग लुगायन।
देख्यों, दुरयौ वह कुंज कुटीर में बैठ्यौ
पलोटतु राधिका पायन।।
शेष, गणेश, महेश, दिनेश और सुरेश जिनका पार नहीं पा सके, वेद अनादि, अनन्त, अखण्ड, अभेद कहकर नेति-नेति के भ्रमसागर में डूब गये, उनके स्वरूप का इतना भव्य रसमय दर्शन जिस सुन्दर रीति से रसखान ने किया, वह इतिहास की एक अद्भुत घटना है। भक्ति-साहित्य का रहस्यमय वैचित्र्य है। वे आजीवन ब्रज में ही भगवान की लीला को काव्यरूप देते हुए विचरण करते रहे। भगवान ही उनके एकमात्र स्नेही, सखा और सम्बन्धी थे।
Raskhan ke Savaiye/ रसखान के सवैयों का
भावार्थ
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि
कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।रौं
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की
धेनु चराय बिसारौं॥रौं
रसखान कबौं इन आँखिन सों, सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।रौं
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, हौं गुंज की माल गरें पहिरौंगी रौं ।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन
ग्वारनि संग फिरौंगी रौं ॥
भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे
कहे सब स्वांग करौंगी रौं ।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा
न धरौंगी रौं ॥
काननि दै अँगुरी जबहीं मुरली
धुनि मन्द बजैहै।
मोहनी तानन सों अटा चढ़ि गोधन
गैहे तौ गैहै।।
टेरि कहौं सिगरे ब्रज लोगानि
काल्हि कोऊ कितनो समुझैहै।
माइ री वा मुख की मुसकानि
सम्हारी न जैहै, न जैहे, न जैहे।।
रसखान एक मुस्लिम कवि होते हुए भी एक सच्चे कृष्णभक्त थे. उनके
द्वारा रचित सवैये में कृष्ण एवं उनकी लीला-भूमि
वृन्दावन की प्रत्येक वस्तु के प्रति उनका लगाव प्रकट हुआ है। प्रथम सवैये में कवि
रसखान कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति का उदाहरण पेश करते
हैं। वह कहते हैं कि ईश्वर उन्हें चाहे मनुष्य बनाए या पशु-पक्षी या फिर पत्थर, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वो सिर्फ कृष्ण का साथ चाहते हैं।
इस तरह हम रसखान के सवैयों में कृष्ण के प्रति
अपार प्रेम तथा भक्ति-भाव को देख सकते हैं। अपने दूसरे सवैये में रसखान ने अपने
ब्रज-प्रेम का वर्णन किया है। वे ब्रज के ख़ातिर
संसार के सभी सुखों का त्याग कर सकते हैं।
अपने तीसरे सवैये में रसखान ने गोपियों के
कृष्ण के प्रति अतुलनीय प्रेम को दर्शाया है. उन्हें श्री कृष्ण की हर वस्तु से
प्रेम है। गोपियाँ स्वयं कृष्ण का रूप धारण कर लेना चाहती हैं, ताकि वो कभी उनसे जुदा ना हो सकें। अपने अंतिम सवैये में रसखान कृष्ण की
मुरली की मधुर ध्वनि तथा गोपियों की विवशता का वर्णन करते हैं कि किस प्रकार
गोपिया चाहकर भी कृष्ण को प्रेम किए बिना नहीं रह सकतीं।तीं Raskhan ke
Savaiye
आइये अब हम प्रत्येक सवैये की विस्तृत
व्याख्या देखते हैं:
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि
कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥
व्याख्या1:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रसखान के श्री कृष्ण एवं उनके गांव
गोकुल-ब्रज के प्रति लगाव का वर्णन हुआ है। रसखान का यह मानना है कि ब्रज के कण-कण
में श्री कृष्ण बसे हुए हैं। इसी वजह से वे अपने प्रत्येक जन्म में ब्रज की धरती
पर जन्म लेना चाहते हैं। अगर उनका जन्म मनुष्य के रूप में हो, तो वो गोकुल के ग्वालों के बीच में जन्म लेना चाहते हैं। पशु के रूप में
जन्म लेने पर, वो गोकुल की गायों के साथ घूमना-फिरना चाहते
हैं। अगर वो पत्थर भी बनें, तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर
बनना चाहते हैं, जिसे श्री कृष्ण ने इन्द्र के प्रकोप से
गोकुलवासियों को बचाने के लिए अपनी उँगली पर उठाया था। अगर वो पक्षी भी बनें,
तो वो यमुना के तट पर कदम्ब के पेड़ों में रहने वाले पक्षियों के
साथ रहना चाहते हैं। इस प्रकार कवि चाहे कोई भी जन्म लें, वो
रहना ब्रज की भूमि पर ही चाहते हैं। इस सवैये से कवि रसखान का भगवन श्री कृष्ण के
प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा प्रदर्शित होती है.
व्याख्या 2: कवि रसखान
हर दशा में अपने आराध्य श्रीकृष्ण का सामीप्य पाने की इच्छा रखते हैं. वे कहते हैं
कि यदि मैं अगले जन्म में मनुष्य योनि में जन्म लूँ तो मेरी उत्कट इच्छा है कि मैं
ब्रज में गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच ही अर्थात् एक ग्वाला बनकर निवास करूँ। यदि
मैं पशु बनूँ तो फिर मेरे वश में ही क्या है? अर्थात् पशु
योनि में जन्म लेने पर मेरा कोई वश नहीं है, फिर भी चाहता
हूँ कि मैं नन्द की गायों के मध्य में चरने वाला एक पशु अर्थात् उनकी गाय बनूँ।
यदि पत्थर बनूँ तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनूँ जिसे श्रीकृष्ण ने इन्द्र के
कोप से ब्रज की रक्षा करने के लिए छत्र की तरह हाथ में उठाया था, धारण किया था। यदि मैं पक्षी योनि में जन्म लूँ तो मेरी इच्छा है कि मैं
यमुना के तट पर स्थित कदम्ब की डालियों पर बसेरा करने वाला पक्षी बनूँ अर्थात् हर
योनि और हर जन्म में अपने आराध्य श्रीकृष्ण और ब्रजभूमि का सामीप्य चाहता हूँ और
यही मेरी प्रभु से विनती है।
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।रौं
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की
धेनु चराय बिसारौं॥रौं
रसखान कबौं इन आँखिन सों, सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।रौं
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
व्याख्या1:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि रसखान का भगवान श्रीकृष्ण एवं उनसे
जुड़ी वस्तुओं के प्रति बड़ा गहरा लगाव देखने को मिलता है। वे कृष्ण की लाठी और
कंबल के लिए तीनों लोकों का राज-पाठ तक छोड़ने के लिए तैयार हैं। अगर उन्हें नन्द
की गायों को चराने का मौका मिले, तो इसके लिए वो आठों
सिद्धियों एवं नौ निधियों के सुख को भी त्याग सकते हैं। जब से कवि ने ब्रज के वनों,
नों बगीचों, चों तालाबों इत्यादि को देखा है,
वे इनसे दूर नहीं रह पा रहे हैं। जब से कवि ने करील की झाड़ियों और
वन को देखा है, वो इनके ऊपर करोड़ों सोने के महल भी न्योछावर
करने के लिए तैयार हैं।
व्याख्या 2: श्रीकृष्ण
की प्रिय वस्तुओं के प्रति अपना अतिशय अनुराग दर्शाते हुए कवि रसखान कहते है कि
मैं कृष्ण की लाठी या छङी और कंबल मिल जाने पर तीनों लोकों का सुख-साम्राज्य छोङने
को तैयार हूँ। यदि नन्द की गायें चराने का सौभाग्य मिल तो मैं आठों सिद्धियों और
नौ निधियों के सुख को भी त्याग दूँ, अर्थात् नन्द की गायें चराने
का सुख मिलने पर अन्य सब सुख त्याग सकता हूँ। जब मेरे इन नेत्रों को ब्रजभूमि के
बाग, तालाब आदि देखने को मिल जाए और करी के कुंजों में विचरण
करने का सौभाग्य या अवसर मिल जाएँ ता मैं उस सुख पर सोने के करोङों महलों को
न्यौछावर कर सकता हूँ। कवि रसखान यह कहना चाहते हैं कि मुझे अपने आराध्य श्रीकृष्ण
से सम्बन्धित सभी वस्तुओं से जो सुख प्राप्त हो सकता है, वह
अन्य किसी भी वस्तु से नहीं मिल सकता।
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, हौं गुंज की माल गरें पहिरौंगी रौं ।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन
ग्वारनि संग फिरौंगी रौं ॥
भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे
कहे सब स्वांग करौंगी रौं ।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा
न धरौंगी रौं ॥
व्याख्या1: प्रस्तुत
पंक्तियों में रसखान ने कृष्ण से अपार प्रेम करने वाली गोपियों के बारे में बताया है,
जो एक-दूसरे से बात करते हुए कह रही हैं कि वो कान्हा द्वारा उपयोग
की जाने वाली वस्तुओं की मदद से कान्हा का रूप धारण कर सकती हैं। मगर, वो कृष्ण की मुरली को धारण नहीं करेंगी। यहाँ गोपियाँ कह रही हैं कि वे
अपने सिर पर श्री कृष्ण की तरह मोरपंख से बना मुकुट पहन लेंगी। अपने गले में कुंज
की माला भी पहन लेंगी। उनके सामान पीले वस्त्र पहन लेंगी और अपने हाथों में लाठी
लेकर वन में ग्वालों के संग गायें चराएंगी। गोपियाँ कह रही है कि कृष्ण हमारे मन
को बहुत भाते हैं, इसलिए मैं तुम्हारे कहने पर ये सब कर
लूँगी। मगर, मुझे कृष्ण के होठों पर रखी हुई मुरली अपने
होठों से लगाने के लिए मत बोलना, क्योंकिक्यों इसी मुरली की
वजह से कृष्ण हमसे दूर हुए हैं। गोपियों को लगता है कि श्री कृष्ण मुरली से बहुत
प्रेम करते हैं और उसे हमेशा अपने होठों से लगाए रहते हैं, इसीलिए
वे मुरली को अपनी सौतन या सौत की तरह देखती हैं।
व्याख्या
2: श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम भक्ति रखने वाली कोई गोपी अपनी
सखी से कहती है कि मैं प्रियतम कृष्ण की रूप-छवि को अपने शरीर पर धारण करना चाहती
हूँ। इस कारण मैं अपने सिर पर मोर पंखों का मुकुट धारण करूँगी और गले में घुँघुची
की वनमाला पहनूँगी। मैं शरीर पर पीला वस्त्र पहनकर कृष्ण के समान ही हाथ में लाठी
लेकर अर्थात् उन्हीं के वेश में गायों व ग्वालिनों के साथ घूमती रहूँगी अर्थात्
गायें चराऊँगी। जो-जो बातें उन आनन्द के भण्डार कृष्ण को अच्छी लगती हैं, वे सब मैं करूँगी और तेरे कहने पर कृष्ण की तरह ही वेशभूषा, स्वांग, दिखावा, व्यवहार आदि
करूँगी। रसखान कवि के अनुसार उस गोपी ने कहा कि मैं मुरलीधर कृष्ण की मुरली को
अपने होठों पर कभी धारण नहीं करूँगी। आशय यह है कि मुरली प्रियतम कृष्ण को बहुत
प्रिय है, इसके अधरों पर रखने का अधिकार भी उनका ही है और वे
ही इससे मधुर तान सुना सकते हैं।
काननि दै अँगुरी जबहीं मुरली
धुनि मन्द बजैहै।
मोहनी तानन सों अटा चढ़ि गोधन
गैहे तौ गैहै।।
टेरि कहौं सिगरे ब्रज लोगानि
काल्हि कोऊ कितनो समुझैहै।
माइ री वा मुख की मुसकानि
सम्हारी न जैहै, न जैहे, न जैहे।।
व्याख्या1: रसखान ने
इन पंक्तियों में गोपियों के कृष्ण प्रेम का वर्णन किया है, वो
चाहकर भी कृष्ण को अपने दिलो-दिमाग से निकल नहीं सकती हैं। इसीलिए वे कह रही हैं
कि जब कृष्ण अपनी मुरली बजाएंगे, तो वो उससे निकलने वाली
मधुर ध्वनि को नहीं सुनेंगी। वो सभी अपने कानों पर हाथ रख लेंगी। उनका मानना है कि
भले ही, कि सी नी ली की क्यों येंऔ गी ही क्यों कृष्ण किसी
महल पर चढ़ कर, अपनी मुरली की मधुर तान क्यों न बजायें और
गीत ही क्यों न गाएं, जब तक वो उसे नहीं सुनेंगी, तब तक उन पर मधुर तानों का कोई असर नहीं होने वाला। लेकिन अगर गलती से भी
मुरली की मधुर ध्वनि उनके कानों में चली गई, तो फिर हम अपने
वश में नहीं रह पाएंगी। फिर चाहे हमें कोई कितना भी समझाए, हम
कुछ भी समझ नहीं पाएंगी। गोपियों के अनुसार, कृष्ण की
मुस्कान इतनी प्यारी लगती है कि उसे देख कर कोई भी उनके वश में आए बिना नहीं रह
सकता है। इसी कारणवश, गोपियाँ कह रही हैं कि श्री कृष्ण का
मोहक मुख देख कर, उनसे ख़ुद को बिल्कुल भी संभाला नहीं
जाएगा। वो सारी लाज-शर्म छोड़कर श्री कृष्ण की ओर खिंची चली जाएँगी। व्याख्या 2:
श्रीकृष्ण की मुरली तथा उनकी मुस्कान पर आसक्त कोई गोपी अपने सखी से
कहती है कि जब श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मधुर स्वर में मुरली बजाएँगे तो मैं अपने कानों
में ऊँगली डाल लूँगी, ताकि मुरली की मधुर तान मुझे अपनी ओर
आकर्षित न कर सके या फिर श्रीकृष्ण ऊँटी अटारी पर चढ़कर मुरली की मधुर तान छेङते
हुए गोधन (ब्रज में गया जाने वाला लोकगीत) गाने लगें तो गाते रहें, परन्तु मुझ पर उसका कोई असर नहीं हो पायेगा। मैं ब्रज के समस्त लोगों को
पुकार-पुकार कर अथवा चिल्लाकर कहना चाहती हूँ कि कल कोई मुझे कितना ही समझा ले,
चाहे कोई कुछ भी करे या कहे, परन्तु यदि मैंने
मैं श्रीकृष्ण की आकर्षक मुस्कान देख ली तो मैं उसके वश में हो जाऊँगी। हाय री
माँ! उसके मुख की मुस्कान इतनी मादक है कि उसके प्रभाव से बच पाना या सँभल पाना अत्यन्त
कठिन हैं। मैं उससे प्राप्त सुख को नहीं सँभाल सकूँगी।
प्रश्न: ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन
किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?
उत्तर: कवि ने ब्रजभूमि के प्रति अपने प्रेम
को कई रूपों में अभिव्यक्त किया है। कवि की इच्छा है कि वे चाहे जिस
रूप में जन्म लें, हर रूप में ब्रजभूमि में ही वाह करें। यदि मनुष्य हों तो गोकुल के ग्वालों
के रूप में बसना चाहिए।
यदि पशु हों तो नंद की गायों के साथ चरना चाहिए।
यदि पत्थर हों तो उस गोवर्धन पहाड़ पर होना चाहिए जिसे
कृष्ण ने अपनी उंगली पर उठा लिया था। यदि
पक्षी हों तो उन्हें यमुना नदी के किनार कदम्ब की डाल पर बसेरा
करना पसंद हैं।
प्रश्न: कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारने के पीछे क्या कारण हैं?
उत्तर: कवि का कृष्ण के प्रति जो प्रेम है वह
सभी सीमाओं से परे है। कवि को ब्रज की एक एक वस्तु में कृष्ण ही
दिखाई देते हैं। इसलिए कवि ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारते रहना चाहता है।
प्रश्न: एक लकुटी और कामरिया पर कवि सब कुछ
न्योछावर करने को क्यों तैयार हैं?
उत्तर: कवि हर वह काम करने को तैयार है जिससे
वह कृष्ण के सान्निध्य में रह सके। इसलिए वह एक लकुटी
और कम्बल पर अपना सब कुछ न्योछावर करने को
तैयार है। Raskhan ke Savaiye
प्रश्न: सखी ने गोपी से कृष्ण का कैसा रूप
धारण करने का आग्रह किया था? अपने शब्दों में वर्णन
कीजिए।
उत्तर: सखी ने गोपी से कृष्ण का रूप धारण करने
का आग्रह किया था। वे चाहती हैं कि गोपी मोर मुकुट
पहनकर, गले में
माला डालकर, पीले वस्त्र धारण कर और हाथ में लाठी लेकर पूरे
दिन गायों और ग्वालों के साथ
घूमने को तैयार हो जाये। इससे सखियों को हर
समय कृष्ण के रूप के दर्शन होते रहेंगे।
प्रश्न: आपके विचार से कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी कृष्ण का सान्निध्य क्यों प्राप्त करना
चाहता है?
उत्तर: कवि कृष्ण से इतना प्रेम करता है कि
अपना पूरा जीवन उनके समीप बिताना चाहता है। इसलिए वह जिस
रूप में संभव हो उस रूप में ब्रजभूमि में रहना
चाहता है। इसलिए कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी
कृष्ण
का सान्निध्य प्राप्त करना चाहता है।
प्रश्न: चौथे सवैये के अनुसार गोपियाँ अपने आप
को क्यों विवश पाती हैं?
उत्तर: कृष्ण की मुरली की धुन इतनी मोहक होती
है कि उसे सुनने के बाद कोई भी अपना आपा खो देता है।
गोपियाँ वह हर काम कर सकती हैं जिससे उनपर
कृष्ण के पड़ने वाले प्रभाव को छुपा सकें। लेकिन उनका सारा
प्रयास कृष्ण की मुरली की तान पर व्यर्थ हो
जाता है। उसके बाद उनके तन मन की खुशी को छुपाना असंभव हो
जाता है। इसलिए गोपियाँ अपने आप को विवश पाती
हैं।
प्रश्न: भाव स्पष्ट कीजिए:
कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर
वारौं।रौं
उत्तर: कृष्ण के प्रेम के लिए वे किसी भी हद
तक जाने को तैयार हैं। यहाँ तक कि ब्रज की कांटेदार झाड़ियों के लिए भी वे सौ
महलों को भी निछावर कर देंगे।
माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै।
उत्तर: लेकिन गोपियों को ये भी डर है और
ब्रजवासी भी कह रहे हैं कि जब कृष्ण की मुरली बजेगी तो उसकी टेर सुनकर गोपियों के
मुख की मुसकान सम्हाले नहीं सम्हलेगी। उस मुसकान से पता चल जाएगा कि वे कृष्ण के
प्रेम में कितनी डूबी हुई हैं।
प्रश्न: ‘कालिंदी कूल कदंब की डारन’ में कौन
सा अलंकार है?
उत्तर: यहाँ पर ‘क’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।
इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
प्रश्न: काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए: या मुरली
मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी रौं ।
उत्तर: इस वाक्य में अनुप्रास अलंकार का
प्रयोग हुआ है। कवि ने ब्रजभाषा का प्रयोग बड़ी दक्षता के साथ किया है। इस छोटी सी
पंक्ति से कवि ने बहुत बड़ी बात व्यक्त की है। गोपियाँ कृष्ण का रूप धरने को तैयार
हैं लेकिन उनकी मुरली को अपने होठों से लगाने को तैयार नहीं हैं। ऐसा इसलिए है कि
वह मुरली गोपियों को किसी सौतन की तरह लगती है जो सदैव कृष्ण के अधरों से लगी रहती
है।
लाचित बोरफूकन (Lachit Borphukan)
पूरे भारत पर राज करने वाले मुगल शासकों के विजय रथ का पहिया बंगाल से आगे पूर्वोत्तर में नहीं पहुंच सका। मुगल ताकत और पूर्वोत्तर भारत पर फतह के बीच केवल एक शख्स अड़ गया, जिसका नाम है लाचित बोरफूकन (Lachit Borphukan)। असम के इतिहास और लोकगीतों में लाचित बोरफूकन का चरित्र मराठा वीर शिवाजी की तरह अमर है। 17वीं सदी में आहोम साम्राज्य के कमांडर लाचित ने ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर मुगलों की शक्तिशाली सेना को धूल चटा दी थी।
लाचित बरफूकन आहोम
साम्राज्य के एक
सेनापति और बरफूकन थे, जो
कि सन 1671 में हुई सराईघाट
की लड़ाई में
अपनी नेतृत्व-क्षमता के लिए जाने जाते हैं, जिसमें असम पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के लिए रामसिंह प्रथम के
नेतृत्व वाली मुग़ल सेनाओं का प्रयास विफल कर
दिया गया था।
1665 में लचित को अहोम सेना का
मुख्य सेनाध्यक्ष यानी बरफूकन बनाया गया। अहोम सेना में दस जवानों का नायक डेका कहलाता था, 100 का सैनिया, एक हज़ार का
हज़ारिका, 3 हज़ार का राजखोवा और 6 हज़ार
जवानों का नायक फूकन कहलाता था। बरफूकन उन सभी का प्रमुख होता था।
राजा चक्रध्वज ने
गुवाहाटी के शासक मुग़लों के विरुद्ध अभियान में सेना का नेतृत्व करने के लिए
लाचित बोड़फुकन का चयन किया।[4] राजा ने उपहारस्वरूप लाचित
को सोने की मूठ वाली एक तलवार (हेंगडांग) और विशिष्टता के प्रतीक पारंपरिक वस्त्र
प्रदान किए.
गुरिल्ला युद्ध और प्रेत का डर
लचित ने उन्होंने सेना में स्थानीय लोगों को भर्ती किया। स्थानीय
संसाधनों का इस्तेमाल कर अस्त्र-शस्त्र तैयार करवाए। नावों का बेड़ा और तोपों का
निर्माण करवाया। लगातार चार साल तक वह युद्ध की तैयारी करते रहे। और बीच-बीच में
मुग़ल प्रतिनिधियों से बातचीत भी ताकि उन्हें युद्ध की तैयारी की भनक न लग पाए।
तोपों में भर
दिया पानी
1667 में मुग़ल राजा ने गुवाहाटी का शासक फिरोज ख़ान को बना दिया।
वह एक नंबर का ऐय्याश था और अहोम राजा पर असम की लड़कियां भेजने का दबाव डालता।
इससे स्थानीय शासकों में गुस्सा भड़कने लगा। लचित तो मौके की तलाश में ही थे। उनके
पास जल सेना थी, लेकिन अश्व वाहिनी का अभाव था। इसलिए क़िले
पर हमला नहीं कर पा रहे थे। और गुवाहाटी को मुक्त कराने के लिए ईटाखुली क़िले पर
कब्जा भी ज़रूरी था।
इसके लिए लचित ने पहले रणनीति तैयार की। अपने सहयोगी इस्माइल
सिद्दीकी उर्फ बाघ हज़ारिका की अगुवाई में एक सैन्य टुकड़ी भेजी। कुछ जवान रात के
अंधेरे में क़िले की दीवार पर चढ़कर अंदर चले गए और मुग़लों की तोप की नली में पानी
भर दिया।
अगली सुबह क़िले पर हमला हुआ। मुग़ल तोप बेकार हो चुके थे। इस तरह
लचित ने अपनी सूझबूझ से मुग़लों को एक बड़ा झटका दिया और गुवाहाटी पर अहोम शासन
क़ायम हुआ। इस पराजय की ख़बर मिलते ही मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब गुस्से से पागल हो
उठा। उसने अपने सेनापति राम सिंह के नेतृत्व में 70 ह़जार
सैनिकों का विशाल दल, एक हज़ार तोपों के साथ बड़ी नौकाओं में
रवाना कर दिया। यह सेना ब्रह्मपुत्र नदी के रास्ते गुवाहाटी के क़रीब पहुंची।
लचित बरफूकन ने रणनीति के तहत उन्हें गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर के
पास तक आने दिया, क्योंकि गुरिल्ला युद्ध के लिए वह जगह
बेहतर थी। दोनों तरफ पहाड़ियां, घने जंगल और बांस के झुरमुट
थे। ब्रह्मपुत्र नदी के उस पार मुग़लों ने अपना शिविर लगाया था।
छोटी नावों से
तैयार जीत का पुल
अहोम
सेना मुग़लों की विशाल सेना से सीधे युद्ध करने की स्थिति में नहीं थी। सो, लचित ने रात के वक्त़ गुरिल्ला युद्ध करने की रणनीति बनाई। रात में जिस
आवेग से उनके योद्धा हमला करते, उसे देख मुग़ल सैनिकों में
ख़ौफ बैठ गया। वे कहते थे कि अहोम सैनिक राक्षस हैं। उनके पास प्रेत शक्ति है।
इसीलिए वे रात में हमला करते हैं।
लचित के नेतृत्व में अहोम योद्धाओं के गुरिल्ला युद्ध और पराक्रम से
उनका मनोबल टूटने लगा। घबराकर मुग़ल सेनापति राम सिंह ने लचित से रात में हमला न
करने का आग्रह किया। इस पर अहोम सेनापति ने जो जवाब दिया, लोग
उसे आजतक याद करते हैं।
लचित ने मुग़लों के सेनापति से कहा, ‘शेर
हमेशा रात में ही हमला करते हैं।’ अहोम सैनिकों की प्रेत शक्ति का जो भय रामसिंह
के सैनिकों में समाया था, लचित ने उनका भी फ़ायदा उठाया।
उन्होंने अपने सैनिकों को राक्षस की वेश-भूषा में मुग़ल सेना के शिविरों के आसपास
भेजा।
इतिहासकार डॉ. एच. के. बरपुजारी ने अपनी क़िताब ‘कॉम्प्रिहेंसिव
हिस्ट्री ऑफ असम’ में लिखा है, ‘लचित तुरंत युद्ध की रणनीति
बनाते। अक्सर रात में मुग़लों पर हमला करते, जब उनकी सेना
आराम कर रही होती।’
तब मुग़ल सेनापति राम सिंह ने एक चाल चली। उसने अहोम सेना को एक
पत्र भेजा। इसमें लिखा था, ‘लचित ने गुवाहाटी खाली करने के
लिए एक लाख रुपये लिए हैं।’ उसने लचित को पसंद न करने वाले सैन्य अधिकारियों को
घूस भेजकर अहोम सेना में फूट डालने की भी कोशिश की।
यह ख़बर जब अहोम राजा तक पहुंची, तो उन्हें भी
एक बार के लिए लचित की नीयत पर शक़ हुआ। लेकिन प्रधाममंत्री अतन बरगोहाइरं ने
उन्हें समझाया कि यह मुग़लों की चाल है। लेकिन कहते हैं न, शक़
का कीड़ा दिमाग़ को खोखला कर देता है। सराइघाट में लचित सीधे युद्ध के पक्ष में
नहीं थे, लेकिन राम सिंह ने युद्ध का आह्वान किया। इधर,
लचित पर शक़ कर बैठे अहोम राजा ने भी जल्दबाज़ी में युद्ध का आदेश
दिया।
अहोम सेना को भारी नुक़सान हुआ। क़रीब 10 हज़ार
सैनिक मारे गए। बचे हुए सैनिक मैदान छोड़ भागने लगे। बरपुजारी लिखते हैं कि जब
मुग़लों की चाल की वजह से अहोम सेना में फूट पड़ी और कुछ सैनिक मैदान से भागने लगे
तो बीमार होने के बावजूद लचित युद्ध के मैदान में उतर गए। भागते सैनिकों ने उनका
यह पराक्रम देखा तो वे अपने बरफूकन के साथ जंग के मैदान में लौट आए। लचित और उसकी
सेना ने अपनी छोटी-छोटी नावों पर बैठ कर मुग़लों की विशालकाय नावों का हमला बोल
दिया।
यहां तक कि इन नावों को जोड़कर ब्रह्मपुत्र पर पैदल पार पुल तैयार
दिया। इस बीच मुग़ल सेना के कप्तान मुन्नावर ख़ान अहोम सेना के हमले में नाव पर ही
मारे गए। अब मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई। हार कर राम सिंह को अपनी सेना के साथ पीछे
हटना पड़ा। सराइघाट के इस ऐतिहासिक युद्ध के बाद मुग़लों ने फिर कभी असम की तरफ
नहीं देखा।
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (National Defence Academy) के
सर्वश्रेष्ठ कैडेट को लचित बोरफूकन स्वर्ण पदक (The Lachit Borphukan Gold
Medal) प्रदान किया जाता है। इस पदक को रक्षाकर्मियों हेतु बोरफुकन
की वीरता से प्रेरणा लेने और उनके बलिदान का अनुसरण करने के लिये वर्ष 1999
में स्थापित किया गया था। 25 अप्रैल,
1672 को इनका निधन हो गया।
उनका मृत शरीर जोरहाट से
16 किमी दूर हूलुंगपारा में स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वारा
सन 1672 में निर्मित लचित स्मारक में विश्राम कर रहा है।
लाचित बोड़फुकन का कोई चित्र उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक पुराना इतिवृत्त उनका
वर्णन इस प्रकार करता है, "उनका मुख चौड़ा है और
पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह दिखाई देता है। कोई भी उनके चेहरे की ओर आँख उठाकर
नहीं देख सकता."
लाचित जमीन से जुड़े योद्धा थे. उनका जन्म भले ही असम में
सत्तासीन अहोम राजवंश से जुड़े एक बड़े सामंत के घर हुआ था. लेकिन उन्हें अपने
सामान्य सैनिकों के साथ भोजन करने या उठने बैठने में कोई परहेज नहीं था. यही वजह
था कि लाचित के सिपाही उनकी एक आवाज पर जान देने के लिए तैयार रहते थे. उनके सेनापतित्व में आहोम सैनिकों का मनोबल बेहद ऊंचा रहता था. यही कारण
था कि वह मुगलों जैसे दुश्मनों के लिए साक्षात् काल साबित होते थे. सराईघाट में साल 1671 में हुए युद्ध ने लाचित
बोरफुकन का नाम अमर कर दिया. उनकी वजह से धर्मांध औरंगजेब का असम पर कब्जे का सपना
हमेशा के लिए टूट गया. असम सरकार ने साल
2000 में लाचित बोरपुखान अवॉर्ड देना शुरु किया. उनके जन्मदिन 24
नवंबर को ‘लाचित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. असम में उनकी प्रतिमाएं लगी हुई हैं. लेकिन दुखद यह है कि लाचित बोरफुकन की वीरगाथा हमारी
इतिहास की किताबों से गायब हैं. क्योंकि मुगलों को महान और अपराजेय बताने के लिए
उनकी बहादुरी को नजरअंदाज कर दिया गया|. असम के
पूर्व राज्यपाल और वरिष्ठ सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा तो लचित के
पराक्रम की तुलना शिवाजी से करते हैं। ‘एमुलेट द स्पिरिट एंड स्किल ऑफ लचित
बरफूकन’ नाम की क़िताब में उन्होंने लिखा, ‘मध्यकालीन
भारत ने दो महान सैन्य नेता दिए। एक ओर महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी थे तो दूसरी
तरफ असम में लचित बरफूकन। दोनों लगभग समकालीन थे।’ सिन्हा
ने राष्ट्रीय डिफेंस एकेडमी ने लचित की प्रतिमा स्थापित कराई।
सरायघाट की लड़ाई में करारी हार के बाद मुगल पीछे हट गए और फिर कभी
भी असम पर आक्रमण के लिए नहीं लौटे। असम में ब्रह्मपुत्र नदी की कल-कल
बहती धारा में आज भी सराइघाट के महान युद्ध की गूंज सुनी जा सकती है। इस युद्ध में
अहोम सेना ने मुग़लों की विशाल सेना को करारी शिक़स्त देकर असम को आज़ाद कराया था।
इस ऐतिहासिक युद्ध के नायक थे, महान यौद्धा लचित बरफूकन।
महारानी अहिल्या बाई होल्कर
महारानी अहिल्याबाई इतिहास-प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं। अहिल्याबाई किसी बड़े भारी राज्य की रानी नहीं थीं, बल्कि एक छोटे भू-भाग पर उनका राज्य कायम था और उनका कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था, इसके बावजूद जनकल्याण के लिए उन्होंने जो कुछ किया, वह आश्चर्यचकित करने वाला है, वह चिरस्मरणीय रहेगा|
उनका जन्म महाराष्ट्र के चोंडी गांव में 1725 में हुआ था। उनके पिता मानकोजी शिंदे खुद धनगर समाज से थे, जो गांव के पाटिल की भूमिका निभाते थे। उनके पिता ने अहिल्याबाई को
पढ़ाया-लिखाया। युवा अहिल्यादेवी के चरित्र और सरलता ने इन्दौर राज्य के संस्थापक महाराज मल्हार राव होल्कर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उनकी शादी अपने बेटे खांडे राव से
करवा दी|
कहते
है की एक बार राजा मल्हार राव होल्कर पुणे जा रहे थे और उन्होंने चौंढी गाँव में
विश्राम किया, उस समय अहिल्याबाई गरीबों की मदद कर रही थी.
उनका प्रेम और दयाभाव देखकर मल्हार राव होल्कर ने अपने बेटे खण्डेराव होलकर के लिए
अहिल्याबाई का हाथ मांग लिया था.
उस समय
अहिल्याबाई की उम्र महज 8 वर्ष थी, वह 8 वर्ष की आयु में मराठा की रानी बन गई थी.
इस तरह अहिल्या बाई एक दुल्हन के तौर पर मराठा समुदाय के
होल्कर राजघराने में पहुंची।
सन्
1745 में अहिल्याबाई के पुत्र हुआ और तीन वर्ष बाद एक
कन्या। पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्ताबाई रखा। उन्होंने बड़ी कुशलता
से अपने पति के गौरव को जगाया। कुछ ही दिनों में अपने महान पिता के मार्गदर्शन में
खण्डेराव एक अच्छे सिपाही बन गये। मल्हारराव को भी यह देखकर संतोष होने लगा।
पुत्र-वधू अहिल्याबाई को भी वह राजकाज की शिक्षा देते रहते थे। उनकी बुद्धि और चतुराई से वह बहुत प्रसन्न होते
थे।
दुर्भाग्य वश अहिल्याबाई के पति खांडेराव
होलकर 1754 के कुम्भेर युद्ध में वीरगति
को प्राप्त हुए.
अहिल्या
के लिए यह एक बड़ी क्षति थी. वह बुरी तरह टूट चुकी थीं और सती होना चाहती थीं, लेकिन ससुर मल्हारराव ने उन्हें समझाया. उन्होंने यह कहते हुए अहिल्या को
प्रेरित किया कि तू ही मेरा बेटा है? तेरे सिवा मेरे पास अब
क्या बचा है? बेटी तू चली जायेगी तो मैं क्या करूंगा?
इस बूढ़े बाप के बारे में सोच और सती होने की बात मन से निकाल दे.
पिता समान ससुर को आसुंओं में भीगा देखकर अहिल्या का मन पसीज गया और उन्होंने दिल
पर पत्थर रखकर उनकी बात मान ली.
अब अहिल्यादेवी पर जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपने
ससुर के कहने पर न केवल सैन्य मामलों में बल्कि प्रशासनिक मामलों में भी रुचि
दिखाई और प्रभावी तरीके से उन्हें अंजाम दिया।
12 साल बाद उनके
ससुर मल्हार राव होलकर की भी मृत्यु हो गयी. मल्हारराव के निधन के बाद उन्होंने पेशवाओं की गद्दी से
आग्रह किया कि उन्हें क्षेत्र की प्रशासनिक बागडोर सौंपी जाए। मंजूरी मिलने के बाद
1766 में रानी अहिल्यादेवी
मालवा की शासक बन गईं। उन्होंने तुकोजी होल्कर को सैन्य कमांडर बनाया। उन्हें उनकी
राजसी सेना का पूरा सहयोग मिला। अहिल्याबाई ने कई युद्ध का नेतृत्व किया। वे एक
साहसी योद्धा थी और बेहतरीन तीरंदाज। युद्ध के दौरान वह खुद अपनी सेना
में शामिल होकर युद्ध करती थी. हाथी की
पीठ पर चढ़कर लड़ती थी।
अहिल्याबाई एक कुशल प्रशासक थीं और अपनी
बुद्धिमत्ता से कठिन से कठिन परिस्थिति में भी रास्ता निकाल लेती थीं। ऐसी ही एक
घटना उनके शासन संभालने के समय ही घटी। हुआ यूं कि उनके रानी बनने से अनेक राजा
चिढ़ गये। उन्हीं में से एक रघोवा भी था। उसने अपनी सेना लेकर मालवा पर धावा बोल
दिया। अहिल्याबाई अपने सेनापति तुकोजी राव के साथ युद्धभूमि पर जा पहुंची।
लेकिन युद्ध शुरू होने से पहले अहिल्याबाई
ने एक युक्ति आजमाने की सोची। उन्होंने रघोवा को एक पत्र लिखा। 'मेरे पूर्वजों के बनाए और संरक्षित किए राज्य को हड़पने का सपना राघोबा आप
मत देखिए. अगर आप आक्रमण के लिए आमादा हैं तो आइए, द्वार
खोलती हूं. मेरी स्त्रियों की सेना आपका वीरता से सामना करने को तैयार खड़ी हैं.
अब आप सोचिए. आप को हार मिली तो संसार क्या कहेगा, राघोबा
औरतों के हाथों हार गया. अगर जीत भी मिल जाए तो आपके चारण और भाट आपकी प्रशस्ति
में क्या गाएंगे? राघोवा सेना लेकर आया, एक विधवा और पुत्र शोक में आकुल एक महिला को हराने ताकि अपना लालच पूरा कर
सके. पेशवाई किसे मुंह दिखाएगी?'
उस चिट्ठी को पढ़ने के बाद राघोवा डर गया।
उसके लिए यह पत्र किसी तीखे
तीर से अधिक तीखा था. उसे ऐसे किसी जवाब की उम्मीद नहीं थी. राघोवा ने तुको जी के
हाथों जवाब भेजा|आप गलत समझ रहीं हैं
रानी. मैं तो बस आपको शोक-संवेदना जताने आया हूं. तब रानी (Ahilyabai
Holkar) ने कहा- ठीक है आइए, लेकिन सेना लेकर
नहीं. खुली पालकी में बैठकर. मैं खुद आपका हल्दी-कुमकुम से स्वागत करूंगी. और इस तरह अहिल्याबाई ने बिना लड़े हुए वह युद्ध जीत लिया।
एक बार जब उदयपुर की सेना के सहयोग से रामपुर के सरदार ने मालवा से
विद्रोह किया तब 60 साल की रानी ने कवच चढ़ाकर हाथ में तलवार ले,
युद्ध में खूब कौशल दिखाया. उदयपुर की सेना के पांव उखड़ गए.
अहिल्याबाई की समझदारी का एक और निर्णय उनकी पुत्री
के विवाह से भी सम्बंधित है। हुआ यूं कि एक बार उनके राज्य में एक डकैत का आतंक
काफी बढ़ गया था। उससे मुक्ति पाने के लिए उन्होंने यह घोषणा कर दी, कि जो कोई डकैत का खात्मा करेगा, उससे वो अपनी बेटी मुक्ताबाई का विवाह करेंगी। यह घोषणा सुनकर यशवंतराव
नामक युवक ने अत्यंत साहस का परिचय दिया और उस डकैत को मार गिराया। अहिल्याबाई
यशवंत राव की इस बहादुरी से बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने अपनी पुत्री मुक्ताबाई
का विवाह यशवंत राव से कर दिया।
रानी
अहिल्याबाई अपनी राजधानी महेश्वर ले गईं. वहां उन्होंने 18वीं सदी का बेहतरीन और आलीशान अहिल्या महल बनवाया। पवित्र नर्मदा नदी के
किनारे बनाए गए इस महल के ईर्द-गिर्द बनी राजधानी की पहचान बनी टेक्सटाइल
इंडस्ट्री। उस दौरान महेश्वर साहित्य, मूर्तिकला, संगीत और कला के क्षेत्र में एक गढ़ बन चुका था। मराठी कवि मोरोपंत,
शाहिर अनंतफंडी और संस्कृत विद्वान खुलासी राम उनके कालखंड के महान
व्यक्तित्व थे।
कलकत्ता
से बनारस तक की सड़क, बनारस में अन्नपूर्णा का मन्दिर, गया में विष्णु मन्दिर उनके बनवाये हुए हैं। इन्होंने घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए,
भूखों के लिए सदाब्रत(अन्नक्षेत्र) खोले, प्यासों
के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति
शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की। रानी अहिल्याबाई ने इसके अलावा काशी,
गया, सोमनाथ, अयोध्या,
मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका,
बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ
पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए |
इसके साथ
ही उन्होंने मुख्य तीर्थस्थान जैसे गुजरात के द्वारका, काशी विश्वनाथ, वाराणसी का गंगा घाट, उज्जैन, नाशिक, विष्णुपद मंदिर
और बैजनाथ के आस-पास बहुत
सी धर्मशालाए भी बनवायी. उन्होंने 1777 में विश्व
प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया। और सोमनाथ में शिवजी का मंदिर
बनवाया. जो आज भी पूजा जाता है.
रानी
अहिल्याबाई ने अपने साम्राज्य महेश्वर और इंदौर में भी काफी मंदिरो का निर्माण भी किया
था. अपने साम्राज्य को उन्होंने समृद्ध बनाया और सरकारी पैसा बेहद बुद्धिमानी से
कई किले, विश्राम गृह, कुएं और सड़कें
बनवाने पर खर्च किया। अहिल्याबाई ने इंदौर को एक छोटे-से गांव से खूबसूरत शहर
बनाया। मालवा में कई किले और सड़कें बनवाईं।
अहिल्याबाई का मानना था कि धन, प्रजा व ईश्वर की दी
हुई वह धरोहर स्वरूप निधि है, जिसकी मैं मालिक नहीं बल्कि
उसके प्रजाहित में उपयोग की जिम्मेदार संरक्षक हूँ । उत्तराधिकारी न होने की
स्थिति में अहिल्याबाई ने प्रजा को दत्तक लेने का व स्वाभिमान पूर्वक जीने का
अधिकार दिया।
अहिल्याबाई
के राज्य में प्रजा पूरी तरह सुखी व संतुष्ट थी क्योंकि उनका विचार था कि प्रजा का संतोष ही राज्य का
मुख्य कार्य होता है। लोकमाता अहिल्या का मानना था कि प्रजा का पालन संतान की तरह
करना ही राजधर्म है । राज्य की सत्ता पर बैठने के पूर्व ही
उन्होंने अपने पति–पुत्र सहित अपने सभी परिजनों को खो दिया था इसके बाद भी प्रजा
हितार्थ किये गए उनके जनकल्याण के कार्य प्रशंसनीय हैं।
हर दिन वह अपनी प्रजा से बात करती थी। उनकी समस्याएं सुनती थी तथा न्याय-पूर्वक निर्णय देती थीं। उनके राज्य
में जाति भेद को कोई मान्यता नहीं थी व सारी प्रजा समान रूप से आदर की हकदार थी।
इसका असर यह था कि
अनेक बार लोग निजामशाही व पेशवाशाही शासन छोड़कर इनके राज्य में आकर बसने की इच्छा
स्वयं इनसे व्यक्त किया करते थे ।
अहिल्याबाई का सारा जीवन वैराग्य, कर्त्तव्य-पालन
और परमार्थ की साधना का बन गया। सारा राज्य उन्होंने शंकर को अर्पित कर रखा था और
आप उनकी सेविका बनकर शासन चलाती थी। शिव के प्रति
उनके समर्पण भाव का पता इस बात से चलता है कि अहिल्याबाई राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर
करते समय अपना नाम नहीं लिखती थी, बल्कि पत्र के नीचे केवल
श्री शंकर लिख देती थी। उनके रुपयों पर शिवलिंग और बिल्व पत्र का चित्र ओर पैसों
पर नंदी का चित्र अंकित है। कहा जाता है कि तब से लेकर
भारतीय स्वराज्य की प्राप्ति तक उनके बाद में जितने नरेश इंदौर के सिंहासन पर आये
सबकी राजाज्ञाऐं जब तक कि श्रीशंकर की नाम से जारी नहीं होती, तब तक वह राजाज्ञा नहीं मानी जाती थी और उस पर अमल भी नहीं होता था।
उपलब्धियां :
एक महिला होने
के नाते उन्होंने विधवा महिलाओं को अपने पति की संपत्ति को हासिल करने और बेटे को
गोद लेने में मदद की।
अहिल्याबाई
होल्कर का चमत्कृत कर देने वाले और अलंकृत शासन 1795 में खत्म हुआ, जब उनका निधन हुआ।
उनकी महानता और सम्मान में भारत सरकार ने 25
अगस्त 1996 को उनकी याद में एक डाक टिकट जारी
किया। इंदौर के नागरिकों ने 1996 में उनके नाम से एक
पुरस्कार स्थापित किया। असाधारण कृतित्व के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है। इसके
पहले सम्मानित शख्सियत नानाजी देशमुख थे।
जीवन में परेशानियाँ कितनी भी हो, उनसे
कैसे निपटना है यह हमें अहिल्या बाई के जीवन से सीखना चाहिए. अपने जीवन काल में
अहिल्या बाई होल्कर ने बहुत परेशानियों का सामना किया है लेकिन उन्होंने कभी हार
नहीं मानी, यही वजह है की भारत सरकार ने भी उनको सम्मानित
किया, उनके नाम डाक टिकेट भी जारी हुआ और आज अहिल्या बाई के
नाम से अवार्ड भी दिया जाता है.
अहिल्याबाई
ने विधवा महिलाओं और समाज के लिए किए कई काम
महारानी अहिल्याबाई की पहचान एक विनम्र एवं उदार
शासक के रुप में थी।
उन्होंने समाज में विधवा महिलाओं की स्थिति पर
भी खासा काम किया और उनके लिए उस वक्त बनाए गए कानून में बदलाव भी किया था।
दरअसल, अहिल्याबाई के मराठा प्रांत का शासन संभालने से
पहले यह कानून था कि, अगर कोई महिला विधवा हो जाए और उसका
पुत्र न हो, तो उसकी पूरी संपत्ति सरकारी खजाना या फिर
राजकोष में जमा कर दी जाती थी, लेकिन अहिल्याबाई ने इस कानून
को बदलकर विधवा महिला को अपनी पति की संपत्ति लेने का हकदार बनाया।
अहिल्याबाई के गद्दी पर बैठने के पहले शासन का ऐसा नियम था कि यदि किसी महिला का पति मर जाए और उसका पुत्र न हो तो उसकी संपूर्ण संपत्ति राजकोष में जमा कर दी जाती थी, परंतु अहिल्या बाई ने इस क़ानून को बदल दिया और मृतक की विधवा को यह अधिकार दिया कि वह पति द्वारा छोड़ी हुई संपत्ति की वारिस रहेगी और अपनी इच्छानुसार अपने उपयोग में लाए और चाहे तो उसका सुख भोगे या अपनी संपत्ति से जनकल्याण के काम करे।
इसके अलावा उन्होंने महिला शिक्षा पर भी खासा
जोर दिया। अपने जीवन में तमाम परेशानियां झेलने के बाद जिस तरह महारानी अहिल्याबाई
ने अपनी अदम्य नारी शक्ति का इस्तेमाल किया था, वो काफी प्रशंसनीय है।
वे नारी शक्ति, धर्म, साहस, वीरता, न्याय, प्रशासन, राजतंत्र की
मिसाल हैं। उन्होंने होल्कर साम्राज्य की प्रजा का एक पुत्र की भांति लालन-पालन
किया तथा उन्हें सदैव अपना असीम स्नेह बांटती रही।
लोकमाता
अहिल्या की प्रतिष्ठा का प्रमुख कारण यह नहीं है कि उन्होंने देशभर के तीर्थों, चारों धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों व अनेक मंदिरों
में पुनरुद्धार के कार्य कराए, अन्न क्षेत्र आरंभ किए,
धर्मशालाएं बनवाईं, नदियों पर बांध बंधवाए,
वृक्षारोपण कराया, सड़कें व बावड़ियां बनवाईं और
मस्जिदों तथा पीर दरगाहों को भी मदद की बल्कि लोक उन्हें इसलिए पूजता है क्योंकि
उन्होंने स्वयं को एक ऐसे उदाहरण के रूप में स्थापित किया जिसका सब कुछ था लेकिन
स्वयं के लिए कुछ भी नहीं था। जो कुछ भी था वह लोक के लिए था। उन्होंने अपनी निजता
को समग्रता के लिए न्यौछावर कर दिया था। उनके
निजस्व की धारा समग्रता के सागर में विलीन हो गई थी और इसी कारण वे सरिता नहीं
रहीं समुद्र हो गईं। संसार में सरिताएं तो बहुतेरी हैं लेकिन समुद्र गिने चुने।
लोकमाता
अहिल्या द्वारा सरयू, नर्मदा, गंगा और गोदावरी के तटों पर घाटों का
निर्माण, अयोध्या से नेमावर तक के मंदिरों में पूजा व्यवस्था
तथा सात बड़े नगरों में अन्न क्षेत्रों
की स्थापना करना आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा भारत के चारों शीर्षों पर पवित्र धामों की स्थापना कर समूचे
भारत को एक सूत्रता में आबद्ध करने की याद दिलाता है|
देवी अहिल्या का दूसरा पक्ष उनके सुशासन और दूरदर्शिता का है। कुछ इतिहासकारों
का मत है कि उनके धार्मिक कृत्यों के कारण सुशासन पर विपरीत प्रभाव पड़ा लेकिन
स्वयं अभिलेख ही इसका खंडन करते हैं। देवी अहिल्या के पास खासगी व
सरंजामी नामक दो कोष थे। इसमें खासगी उनका निजी कोष था जो उन्हें उनके ससुर से
विरासत में मिला था। इस कोष में सोलह करोड़ रुपए उस समय उन्हें मिले थे साथ ही
नियमित आय भी इस ट्रस्ट के अंतर्गत आने वाले गांवों से प्राप्त होती थी जबकि
सरंजामी कोष से प्रशासन व सेना का खर्च चलता था। उन्होंने अपने निजी कोष के समस्त
धन को भी सार्वजनिक हित में ही लगा दिया।
डाकुओं
और भीलों को उन्होंने समाज की मुख्य धारा में लाने का यत्न किया तथा समाज के
उपेक्षित लोगों की सेवा को उन्होंने ईश्वर की सेवा माना। उनकी व्यावसायिक
दूरदृष्टि का उदाहरण महेश्वर का वह वस्त्रोद्योग है जहां आज भी सैकड़ों बुनकरों को
आजीविका मिलती है तथा यहां की साड़ियां विश्वप्रसिद्ध हैं। वे अद्भुत दृष्टि
सम्पन्न विदुषी थीं।
उन्होंने
परदा नहीं किया तथा स्त्रियों के अधिकार के लिए कानून में बदलाव किए जिसके कारण
विधवाओं को पति की सम्पत्ति पर तथा पुत्र को गोद लेने का अधिकार मिला। अहिल्या
देवी ने डाक व्यवस्था आरंभ की तथा सन् 1783 में पदमसी
नेनसी नामक कम्पनी को महेश्वर से पूना तक डाक ले जाने का कार्य सौंपा।
उन्होंने अंग्रेज़ों की कुटिल
चालों की तुलना रीछ की चालों से की जो अपने शत्रु पर सीधा वार नहीं करता अपितु उसे
आलिंगन में लेकर मार डालता है। इसलिए वे कहतीं थीं कि उसके सिर पर प्रहार करना
चाहिए। अंग्रेज़ों के विरुद्ध उन्होंने सभी की एकता का आव्हान किया ।
प्रकृति के
संरक्षण में योगदान: आज हम जिस सीड बाल की बात करते हैं इसका प्रयोग हमें अहिल्याबाई होलकर द्वारा देखने को मिलता है| वो प्रतिदिन 11 हजार पार्थिव शिवलिंग का पूजन करती थीं। मिट्टी से शिवलिंग बनाते वक्त वे हरेक शिवलिंग में अनाज के दाने या
यूं कहें बीज रख देती थीं।
पूजा के
बाद शिवलिंगों को नर्मदा नदी में विसर्जित कर दिया जाता था।ताकि उनमें अंकुरण होकर हरियाली बढ़ सके।
हर खेत की
मेढ़ पर होते थे 20- 20 पेड़ : अहिल्याबाई ने किसानों को आदेश दिया कि खेत
की मेढ़ पर 20-20 छायादार और फलदार पौधे लगाए जाएं। इनमें
नीबू, गुलर, बरगद, पीपल, आम, इमली को प्राथमिकता
दी। इससे मृदा का क्षरण भी नहीं होता था और कृषकों को पेड़ों के फलों को बेचकर
प्राप्त होने वाली राशि मिलती थी।
माता अहिल्या की भूरि-भूरि
प्रशंसा देश और विदेश के विद्वानों, इतिहासकारों
तथा राजनीतिज्ञों ने की है।
ऐनी बेसंट लिखती हैं, “उनके राज में सड़कें दोनों तरफ से वृक्षों से
घिरी रहती थीं। राहगीरों के लिए कुएं और विश्रामघर बनवाये गए। गरीब, बेघर लोगों की जरूरतें हमेशा पूरी की गयीं। आदिवासी कबीलों को उन्होंने
जंगलों का जीवन छोड़ गांवों में किसानों के रूप में बस जाने के लिए मनाया। हिन्दू
और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग समान भाव से उस महान रानी के श्रद्धेय थे और उनकी लम्बी उम्र की कामना करते थे।”
महिला
सशक्तीकरण का कार्य
·
अहिल्याबाई ने स्त्रियों का हमेशा ही सम्मान किया, उनको
उचित स्थान दिया। अहिल्या बाई की ख़ास विशेष सेवक एक महिला ही थी।
· नारीशक्ति का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने यह बता दिया कि स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष से कम नहीं है। वे स्वयं भी पति के साथ रणक्षेत्र में जाया करती थीं। पति के मृत्यु के बाद भी वे युध्द क्षेत्र में जाती थीं और सेनाओं का नेतृत्व करती रहती थीं।
·
अपने शासनकाल में उन्होंने नदियों पर जो घाट स्नान
आदि के लिए बनवाए थे, उनमें महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था भी हुआ करती थी। स्त्रियों के
मान-सम्मान का बड़ा ध्यान रखा जाता था।
·
लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने का जो घरों में थोड़ा-सा चलन था, उसे विस्तार दिया गया। दान-दक्षिणा देने में महिलाओं का वे विशेष ध्यान
रखती थीं।
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